गुरुवार, 16 नवंबर 2023

भोपाल गैस त्रासदी का परिचय :*

 3. *2 दिसंबर : भोपाल गैस त्रासदी दिवस* 

 

*भोपाल गैस त्रासदी का परिचय :* 

विश्व की सबसे भीषण औद्योगिक त्रासदियों में गिनी जाने वाली भोपाल गैस त्रासदी *2 दिसंबर 1984 की रात* को भोपाल में यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड के कीटनाशक संयंत्र में घटित हुई जिसमें *लगभग 4000 लोगों की मृत्यु* हो गई थी। अभी तक वहां के लोग गंभीर चोटों तथा अन्य स्वास्थ संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हैं। यह  एक ऐसा संयंत्र था जो अन्य रसायनों के अतिरिक्त कीटनाशक सेविन (कार्बारिल) बनाता था। इस रसायन के निर्माण में एक अत्यधिक विषाक्त और बहुत खतरनाक मिथाइल आइसोसाइनेट नामक तत्त्व का प्रयोग होता है। *यह गैस उक्त रात को अपने 3 कंटेनरों में से एक (ई 610) से लीक हो गई जिससे सुबह होते-होते हज़ारों लोग मारे गए।* 

 *मुख्य बातें :* 

1. ज़हरीले मिथाइल आइसोसाइनेट के रख-रखाव में सुरक्षा मानदंडों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन किया गया।

2. कंटेनर ई 610 की क्षमता 30 टन की थी परंतु उसमें 42 टन (लगभग 40% अधिक) रसायन रखा गया था जिसमें से 40 टन पूरी तरह से लीक हो गया।

3. खराब रख-रखाव के कारण कंटेनर में पानी का रिसाव हुआ जिस कारण से ऊष्माक्षेपी प्रक्रिया हुई जिससे लगातार रिसाव होता रहा। 

4. तीन सुरक्षा प्रणालियां प्रशीतक, भट्ठियां तथा स्क्रबर या तो काम नहीं कर रहे थे या कम काम कर रहे थे। 

5. हवा का बहाव झुग्गियों की ओर होने के कारण वहां काफ़ी नुकसान हुआ। 

6. खांसी, घुटन, आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी इत्यादि मुख्य लक्षण थे। 

7. भारत सरकार ने संस्था के विरुद्ध मुकदमा कर हर्जाने के 3.3 अरब डॉलर की मांग की परंतु संस्था ने मांग का केवल 15% (4700 लाख डॉलर) का ही भुगतान किया। 8. संस्था के अध्यक्ष वॉरेन एंडरसन को अमेरिका वापिस आने की अनुमति दे दी गई और बाद में 'अनुरोध' के बावजूद भी उन्हें प्रत्यर्पित नहीं किया गया। 

9. कुछ अमेरिकी शोधकर्ताओं ने तोड़फोड़ की आशंका तथा रसायनिक युद्ध हथियार के रूप में एमआईसी की प्रभावकारिता की जांच करने के लिए अपना शोध प्रस्तुत किया। 

10. भोपाल गैस त्रासदी बहुराष्ट्रीय निगमों और निजी पूंजीपतियों के हाथ में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग की ओर संकेत करती है। 

 

*इस अवसर पर की जा सकने वाली गतिविधियां :* 

* औद्योगिक कार्यों में सुरक्षा की अनदेखी से उत्पन्न होने वाले खतरों पर लेख लिखना; 

* सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में औद्योगिक संचालन पर वाद-विवाद प्रतियोगिताएं;

* घोर पूंजीवाद तथा राजनीति और औद्योगिक दिग्गजों की मिलीभगत पर कार्यक्रम; 

* औद्योगिक त्रासदियों पर नाटक, कविताएं, पोस्टर इत्यादि तैयार करना;

* चार्ट प्रदर्शनी; 

* मानव निर्मित त्रासदियों में होने वाली निर्दोष मौतों का शोक और मौन जुलूस।

मेरी क्यूरी का जीवन परिचय :*

 2. *7 नवंबर : मेरी क्यूरी की जयंती* 

 *मेरी क्यूरी का जीवन परिचय :* 

मेरी क्यूरी (मारिया स्क्लोडोवस्का) का जन्म 7 नवंबर 1867 को पोलैंड के वार्सा नामक स्थान पर हुआ था। एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी होने के साथ-साथ वे वहां के क्रांतिकारी संगठनों की छात्र कार्यकर्ता भी थीं। 1891 में अपनी उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए वे पेरिस गईं। वे 1894 में *पियरे क्यूरी* से मिलीं और 1895 में उनसे विवाह कर लिया। 1903 में उन्होंने *डॉक्टर ऑफ़ साइंस* की उपाधि प्राप्त की। *अपने पति तथा हेनरी बेकरेल के साथ मिलकर उन्होंने रेडियोधर्मी अवशेषों से रेडियम को अलग करने के तरीकों को विकसित किया जिसके लिए इन तीनों को 1903 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया।* 1906 में अपने पति की दु:खद मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपना शोध जारी रखा और *1911 में रसायन विज्ञान में अपना दूसरा नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।* शांत, गरिमापूर्ण और विनम्र रहते हुए अपनी दोनों बेटियों का पालन-पोषण किया जिन्होंने क्रमश: विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान को अपने कार्य क्षेत्र के रूप में चुना। उनकी बेटी *ईरीन जोलीट क्यूरी* ने अपने पति *जोलीट* के साथ मिलकर 1935 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया जबकि उनकी दूसरी बेटी *ईव लाबोसे क्यूरी* जो स्वयं एक पत्रकार थी और जिनके पति *लाबोसे जूनियर* उस समय संयुक्त राष्ट्र के यूनिसेफ़ प्रमुख थे, ने संस्था को 1965 का नोबेल शांति पुरस्कार दिलवाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। इस प्रकार मेरी क्यूरी न केवल दुनिया की एकमात्र वैज्ञानिक बन गईं जिन्होंने *विज्ञान की दो अलग धाराओं में नोबेल पुरस्कार* प्राप्त किए अपितु अपने बच्चों को भी इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। *रेडियोधर्मिता* शब्द भी क्यूरी दंपत्ति द्वारा घड़ा गया था। *4 जुलाई 1936* को 66 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हो गया। *रसायन विज्ञान में उनके द्वारा नोबेल प्राप्त करने के शताब्दी वर्ष 2011 को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय रसायन विज्ञान वर्ष के रूप में मनाया गया।* 


 *मेरी क्यूरी और रेडियोधर्मिता :* 

मेरी क्यूरी दो रेडियोधर्मी तत्त्वों, *रेडियम* और *पोलोनियम* की खोज में शामिल थीं, उन्होंने अपनी बेटी ईरीन जोलीट के साथ प्रथम विश्व युद्ध के घायल सैनिकों के घावों को ठीक करने में इन रेडियोधर्मी तत्त्वों का काफ़ी प्रयोग किया। वर्तमान में इनका उपयोग कैंसर चिकित्सा, कृषि, प्रतिक्रिया तंत्र को समझने, जैव परख इत्यादि के लिए किया जाता है। यद्यपि मेरी और उनके पति गरीबी से जूझते रहे और अपनी बेटियों का लालन-पालन भी बड़ी मुश्किल से कर पाए, फिर भी *उन्होंने यह कहते हुए अपनी खोजों को पेटेंट कराने से साफ़ मना कर दिया कि उनका शोध आमजन के लिए होना चाहिए, न कि मुनाफ़ाखोरों के लिए।* उन्होंने अपने नोबेल स्वर्ण पदक को भी युद्ध प्रभावित लोगों और सैनिकों की सहायता के लिए देने का प्रस्ताव किया था। क्यूरी दंपत्ति ने अपनी नोबेल पुरस्कार राशि का काफ़ी हिस्सा दोस्तों, छात्रों तथा गरीबों को दान कर दिया। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है, *"मैडम मेरी क्यूरी शायद एकमात्र ऐसी व्यक्ति थीं जिन्हें प्रसिद्धि भ्रष्ट नहीं कर सकी।"* 


 *एआईपीएसएन की इस अवसर पर की जाने वाली गतिविधियां :* 

* मेरी क्यूरी के जीवन पर पोस्टर प्रदर्शनी तथा व्याख्यान; 

* 'विज्ञान और महिलाएं' विषय पर वाद-विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं; 

* 'विज्ञान और समाज' विषय पर वाद-विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं।

सर सी. वी. रमन

 1.  *7 नवंबर : सर सी. वी. रमन की जयंती* 


 *जीवन परिचय :* 

सर सी. वी. रमन का जन्म 7 नवंबर 1888 को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नामक स्थान पर हुआ। उन्होंने 18 वर्ष की आयु में मद्रास प्रेसीडेंसी कॉलेज से सन् 1906 में स्वर्ण पदक के साथ स्नातकोत्तर परीक्षा पास की। उनका विवाह उनकी बचपन की मित्र लोक सुंदरी से हुआ। कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. आशुतोष मुखर्जी ने 1917 में उन्हें एक संकाय पद देने का प्रस्ताव दिया था। रमन बहुत मेधावी थे। उनकी यह जानने की जिज्ञासा थी कि आसमान नीला क्यों दिखता है; हिमनदी दूधिया/अपारदर्शी क्यों दिखती है; तथा संगीत की विभिन्न ध्वनियां कैसे निकलती हैं। अपने विद्यार्थी कृष्णन के सहयोग से किए गए शोध जिसे कोलकाता में इंडियन एसोसिएशन फ़ॉर कल्टीवेशन ऑफ़ साइंस में किया गया, के परिणाम स्वरूप *28 फ़रवरी 1928 को 'रमन प्रभाव' की खोज हुई जिसके लिए 1930 में उन्हें भौतिकी में नोबेल पुरस्कार दिया गया* जो विज्ञान के क्षेत्र में किसी भारतीय को पहले और अब तक का इकलौता पुरस्कार है। उन्हें सर की उपाधि प्रदान की गई तथा वे भारत से पहले एफ़आरएस बने। *1 नवंबर 1970 को उनकी मृत्यु* हुई। 


रमन जीवनपर्यंत संशयवादी बने रहे। वे कहते थे, *"कोई जन्नत नहीं है, स्वर्ग नहीं है, नर्क नहीं है, पुनर्जन्म नहीं है और न ही कोई अमरता है। जो एकमात्र सत्य है, वह है कि मनुष्य का जन्म होता है, वह जीता है और मर जाता है। इसलिए उसे अपना जीवन ठीक से जीना चाहिए।"* 


 *रमन प्रभाव :* 

प्रकाश की आवृत्तियों की सीमा (जिसे मानव अपनी आंख से देख सकता है) को सात रंगों वी-आई-बी-वाई-ओ-आर के साथ विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम की दृश्य सीमा कहा जाता है। एक अद्वितीय आवृत्ति (unique frequency) वाले विकिरण को मोनोक्रोमेटिक विकिरण कहा जाता है। रमन प्रभाव की खोज से पहले वैज्ञानिक समुदाय का विचार था कि किसी भी वस्तु पर एक मोनोक्रोमेटिक विकिरण रेले स्कैटरिंग द्वारा आवृत्ति में बिना किसी बदलाव के बिखर जाती है। यद्यपि रमन ने तरल बेंज़ीन द्वारा बिखरे हुए एक मोनोक्रोमेटिक विकिरण का उपयोग किया, उन्होंने घटित आवृत्तियों के ऊपर और नीचे नई आवृत्तियों की खोज की। मोनोक्रोमेटिक प्रकाश के रेले स्कैटरिंग के अतिरिक्त अन्य आवृत्तियों में बिखरने को रमन प्रभाव कहते हैं। रमन प्रभाव को अब अणुओं के संरचनात्मक स्पष्टीकरण और खगोलीय अनुप्रयोगों में काफ़ी प्रयोग किया जाता है। *रमन प्रभाव की खोज के दिन को, यानी 28 फ़रवरी को, राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है।* 


 *एआईपीएसएन की इस अवसर पर की जाने वाली गतिविधियां :* 

* चार्ट बनाकर जीवनी पर आधारित प्रदर्शनी; 

* रमन प्रभाव पर व्याख्यान; 

* छात्रों के लिए वाद-विवाद एवं निबंध लेखन प्रतियोगिताएं।

Birsa Munde

 15 नवम्बर, जन्मदिन : जन नायक बिरसा मुंडा ने शोषण, उत्पीड़न के साथ-साथ अंधविश्वास, पाखंड के खिलाफ भी फूंका था बिगुल https://vaigyanikchetna.com/%e0%a4%ac%e0%a4%bf%e0%a4%b0%e0%a4%b8%e0%a4%be-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%82%e0%a4%a1%e0%a4%be/national-birsa-munda-punyatithi-2023-birsa-munda-became-the-god-of-tribals-he-faought-against-british-know-the-story-of-great-tribal-leader-and-freedom-fighter-hpjagranspecial/

रविवार, 19 अगस्त 2018

वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्यों?

वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्यों जरूरी है?
1.प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने के लिये
2. समाज के विकास को समझने के लिए
3 मानवता और शांति के लिए
संक्षेप में वैज्ञानिक दृष्टिकोण
दो हरफी बात..."उतना ही विश्वास , जितने का प्रमाण है"
कारण व प्रभावों का खोजना ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण है । अर्थात तार्किक कारणता
मानव की बड़ी ताकत है वैज्ञानिक दृष्टिकोण
जिसके पास नहीं वह कमजोर है और उसका विश्वास है कि
ईश्वर है, भाग्य है, लिखा हुआ है, पहले का किया हुआ है, कर्मों का फल है, पिछले जन्मों का पाप है , अशुभ घडी का जन्म है,
पृथ्वी पर पाये जाने वाले पशुओं में मनुष्य सबसे कमजोर है।
सोचने की बात है कि यह मानव कहे जाने वाला कमजोर पशु समस्त प्रकृति का मालिक कैसे बना ?
460 करोड़ साल पृथ्वी
4 करोड़ साल पहले भालू आये
5 लाख साल पहले मानव जाति का विकास
विकास की प्रक्रिया में अंगूठा अन्य चारों उँगलियों से अलग हो गया और चारों उंगलियां भी अलग अलग हो गयी। मनुष्य ने अंगूठे का प्रयोग अन्य चारों उँगलियों पर किया । उसने इन दस उँगलियों को एक औजार में बदला और इस औजार ने अपने चारों और की प्रकृति पर कार्य किया । इसके साथ ही इस गतिविधि द्वारा उसका मस्तिष्क विकसित होना और बढ़ना शुरू हुआ। हजारों वर्ष यह प्रक्रिया चली । श्रम की बदौलत मनुष्य ने प्रकृति पर कार्य करना शुरू किया और जिससे उसका मस्तिष्क विकसित हुआ। सोचते पशु भी हैं । "मनुष्य एक औजार बनाने वाला पशु है ।"
मनुष्य ने दो पैरों पर चलना शुरू किया तो आगे के दो पैरों को हाथों के रूप में विकसित किया और प्रकृति पर कार्य करना शुरू किया। स्वर तंतु भी सीधे हो गए । इसीलिए मनुष्य ने भाषा ईजाद की। प्रकृति के साथ मानवीय हाथों तथा मनुष्यों के साथ भाषा के संवाद से मनुष्य का मस्तिष्क आकार में बढ़ा। यह वृद्धि किसी पूजा पाठ या कर्मकांड या पूजा यज्ञ के कारण नहीं हुई । 50000 पीढ़ियों की विरासत है आपका दिमाग । 5 लाख साल पहले पुराणी खोपड़ियों के खोल की धारिता 750 ग्राम है । आज आपका मस्तिष्क 1500 ग्राम का है।
A..Science will not fail for lack of human capacity , where it fails it will be for lack of social organisations to make use of that capacity
B. Science in a given time and space, is always relative never absolute .
वैज्ञानिक दृष्टिकोण तो दूर की बात है,
वैज्ञानिक शिक्षा भी क्या , शिक्षा ही नहीं है
आज के संदर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है। इसके दो पहलू हैं - वैज्ञानिक पद्धति और वैज्ञानिक दृष्टिकोण । वैज्ञानिक पद्धति निरिक्षण , तर्क, अनुमान , अनुभव  और प्रयोग के आधार पर कार्य करती है । लेकिन जब हम वैज्ञानिक प्रणाली (पद्धति)को मूल्यों के साथ जोड़ते हैं तो वैज्ञानिक मानसिकता का निर्माण होता है । ये मूल्य क्या हैं ? ये मूल्य हैं
स्वायत्तता,
व्यापकता,
निडरता,
विनम्रता,
तथा जिज्ञासा हैं ।
हमारे समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विस्तार बहुत ही सीमित हुआ है। यह और ज्यादा होना चाहिए।
अभी भी अन्धविश्वास का बोलबाला है ।
इस दृष्टिकोण की कमी के कारण ही आज का वैज्ञानिक समाज से कटा हुआ है और हमारे समाज में घटित हो रही परिवर्तन की प्रक्रियार्ओं से अनभिज्ञ, लोगों के जीवन के यथार्थ से दूर दिखाई देता है। ज्ञान विज्ञान कैसे विकसित हुआ इसका ऐतिहासिक सन्दर्भ भी है और इस क्षेत्र में कुर्बानियां भी काफी हैं।
  आज के हालात क्या हैं? विज्ञान का मतलब भौतिक जगत को मान लिया जाता है जबकि सामाजिक क्षेत्र अछूता रहता है। इस प्रकार विज्ञान को भी संकीर्ण दायरे में बांध दिया गया । सवाल यही है कि इसे सामाजिक जीवन का हिस्सा किस प्रकार बनाया जाये? वैज्ञानिकता को आधुनिकता के दौर में समझना है तो आधुनिक तौर तरीकों के अंतर्गत रूप में देखना होगा।आधुनिकतावाद का और वैज्ञानिक रूझान का गहरा अन्तर्सम्बन्ध है। ज्ञान विज्ञान आंदोलन या समाज सुधार आंदोलन का वैज्ञानिक रूझान एक बहुत ही महत्वपूर्ण पक्ष है। यह इसीलिये है क्योंकि साइनटिफिक टेम्पर सामाजिक जीवन का जरूरी पक्ष है। नव जागरण के दौर में जब कोई समाज बदलता है तो संभावनाएं पैदा होती हैं - हमारे चिंतन के स्तर पर , हमारे सोचने विचारने के स्तर पर और फिर बात पैदा होती है कि यह विचार व्यवहार में कैसे ढले?
  संभावित और वास्तविक में बड़ा अंतर होता है । आधुनिकता के कई आयाम हैं और अंतर्विरोध भी हैं । आज का जरूरी काम है इन संभावित बातों को लोगों के सामने लेकर आना तथा इस पर विचार करना कि जो कल्पनाएं या वास्तविक संभावनाएं हो सकती थी , मगर नहीं हो सकी, इसकी व्याख्या व विश्लेषण करने की क्षमता का विकास करना । आज के सामाजिक ढांचे में क्यों बदलाव की जरूरत है ? यह विश्लेषण करना कि जो विकास हो सकता था वह वर्तमान ढाँचे में क्यों नहीं कर पाए? इस बात को पूरी तरह से समझ कर ,इसे बदलना, इसके अधूरेपन को देखना समझना तथा इसमें मौजूद विकृतियों को समझते हुए इन मूलभूत ढांचों में बदलाव के प्रयत्न करना । जो स्थापित रूप है और जो संभावित रूप है उसमें हमेशा अंतर रहता है। साइंटिफिक टेम्पर के तीन पक्ष हैं जो एक दूसरे से जुड़े हैं और अलग भी हैं । एकांगीपन से आगे नहीं बढ़ा जा सकता । केवल मात्र वैज्ञानिक पद्धति साइंटिफिक टेम्पर नहीं कही जा सकती इसके साथ वैज्ञानिक रूझान और वैज्ञानिक मानसिकता का शामिल होना बहुत आवश्यक है। हिटलर के वैज्ञानिक वैज्ञानिक पद्धति के ज्ञाता थे मगर फासिस्ट रूझान और फासिस्ट मानसिकता रखते थे। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वास्तव में साइंटिफिक टेम्पर हमारी चेतना का हिस्सा कैसे बने? वैज्ञानिक पद्धति या तकनीक उतनी जरूरी चीज नहीं जितनी जरूरी चीज वैज्ञानिक मानसिकता और वैज्ञानिक रूझान हैं ।
     इसी के साथ फिर विज्ञान और धर्म तथा विज्ञान और नैतिकता के मामले भी जुड़े हुए हैं । डेढ़ सौ साल पहले महात्मा फुले ने कहा था - पेशवा प्रत्येक लड़ाई में जाने से पहले शुभ समय देखा करते थे , अंग्रेजों के विरुद्ध अपना साम्राज्य गंवा बैठे जो कभी शुभी घड़ी नहीं देखते थे और हर लड़ाई जीतते रहे। यह कैसे हुआ ? महात्मा फुले कहते थे -" हमारी माताओं और बेटियों की शादियां 36 गुण मिलाकर होती रही हैं , फिर भी वे असमय विधवा हो जाती हैं । अंग्रेज औरतें कोई ऐसी जन्म पत्री नहीं देखती और फिर भी वे संतोषजनक जीवन व्यतीत करती हैं । यह कैसे होता है? साइंटिफिक टेम्पर के जरूरी पहलू हैं कि दुनिया माया नहीं है- वह ठोस है। संसार हमारे बिना भी है । इसे मटेरियलिज्म कहा जाता है। जबकि आदर्शवाद या आध्यात्मवाद में चेतना प्राथमिक है।  चेतना की प्राथमिकता की समझ मनोगतवाद भी कही जाती है। अर्थात संसार हमारे बावजूद और चेतना सेकंडरी चीज है। यह संसार एक स्वतंत्र इकाई है अपने आप में । इसकी अपनी स्वायत्तता है । यह परिधारना भौतिकवादी है, वस्तुगत है। वास्तव में संसार की आब्जेक्टिविटी है। इसके साथ ही दूसरी बात यह है कि यह संसार अपने आप स्वचालित है- अपने आंतरिक दबावों के कारण । यह संसार का संचालन किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं करता । पूरा का पूरा संसार अपने आप अपने नियमों के तहत चलता है। ( यह ऑटोनोमस है )। तीसरी बात है कि चमत्कारों में विश्वास नहीं करना है। एक बात और है कि इस संसार के अन्तर्सम्बन्ध हैं। इसमें एक नियमितता है । बेतरतीब नहीं है यह। इसमें एक रेगुलेरिटी है। कोई दैव्य शक्ति नहीं है जो इस संसार को चलाती है। ज्यादातर धर्म बाहरी शक्ति की बात करते हैं ।साइंटिफिक टेम्पर वाला आदमी अंध विश्वासी नहीं है - कट्टरपंथी नहीं है।विज्ञान की दुनिया में कोई बात अंतिम नहीं है । इंसान डोगमैटिक नहीं है । जिद्दी नहीं होता। खुले दिमाग का होता है। एक टैंटेविनैस होती है। इसमें एक अधूरापन तो होता है । तथ्य पर या सही बात पर आधारित होती है व जाँच परख के बाद ही उस बात या चीज को गलत या सही ठहराया जाता है। यदि मनुष्य ऐसा नहीं करता तो उसकी वैज्ञानिक सोच नहीं है। धर्म विश्वास पर टिका है । विज्ञान विश्वास पर भी अविश्वास करता है तथा अपने निष्कर्ष आस्था पर आधारित नहीं करता बल्कि इसके निष्कर्ष विश्लेषण करने के बाद आते हैं । कई कट्टरवादी वैज्ञानिक क्या क्यों और कैसे के साथ विचार नहीं करते। असल में वैज्ञानिक खोजबीन वाला प्रश्नसूचक स्वभाव रखते हैं । वे बदलने को तैयार होते हैं ,सुनने को तैयार होते हैं । उनकी डेमोक्रेटिक सोच- बराबर की सोच होती है । सबकी रे को उचित महत्व दिया जाता है। एक खुले समाज में ही साइंटिफिक टेम्पर पनपता है। हर इंसान बराबर है यह खुले दिमाग तथा जनतांत्रिक मान मूल्यों का आधार है। सभी प्रकार की संकीर्णताओं से ऊपर उठकर आधुनिकता , मानवता, जनतंत्र आदि मूल्य वैज्ञानिक में साइंटिफिक टेम्पर के द्वारा ही बनते हैं । इंट्यूशन से, अंदाजे से या रौशनी हो गयी , इन मान्यताओं को तथा अंतर्ज्ञान को विज्ञान प्राथमिक नहीं मानता। इन सब चीजों को जांच परख व तथ्यों के विश्लेषण से एक सिद्धान्त उभरेगा न कि ज्ञान चक्षु पर आधारित चीजें नहीं चल सकती। Proof with reliable evidence  भी साइंटिफिक टेम्पर का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष है । तर्क के साथ सोचना भी बहुत आवश्यक पक्ष है मगर महज तर्क या विवेक काफी नहीं हैं ,तथा उस चीज का replicable होना भी जरूरी है । ज्यादा से ज्यादा सही हो precision भी एक पक्ष है सिद्धान्त का। यह पद्धति ज्यादा से ज्यादा accuracy की भी मांग करती है तथा उसका quantification भी किया जा सके। (मापने लायक हों) तर्क और तथ्य के आधार पर समान पक्ष लेना तथा भावनाओं के रंग में नहीं रंगना । भावनाओं से ऊपर उठकर मनोगत नहीं वस्तुगत ढंग से निर्ममता के साथ चीजों को देखना।
     विज्ञान और नैतिकता के मामले में यह बात सही है कि वैज्ञानिक नैतिकता मानव के हित की बात करती है। संकीर्ण आधारों पर चीजों को नहीं देखा जाता ।
विज्ञान धर्म का विरोधी है , धार्मिक नैतिकता के खिलाफ है यह मिथ्या प्रचार है । मानवीय को ज्यादा मानवीय बनाता है विज्ञान व वैज्ञानिक दृष्टिकोण । जादू टोना ही धर्म नहीं है। - यह अन्धविश्वास है। विज्ञान मनुष्य की सहानुभूतियों को विस्तार देता है । विज्ञानं का धर्म के मानवतावादी पक्ष से कोई टकराव नहीं है । साइंटिफिक टेम्पर इसका विरोधी नहीं है ।
हमारे संविधान में भी आर्टिकल 51(A)(h) में डायरैक्टिव प्रिंसिपल ऑफ़ स्टेट पॉलिसी के तहत कहा गया है कि यह भारत के हरेक नागरिक का कर्तव्य होगा कि साइंटिफिक टेम्पर , मानवता वाद, स्पिरिट ऑफ़ इन्क्वायरी और रिफार्म का विकास करे।
अब सवाल ये उठता है कि भारत में वैज्ञानिक मानसिकता की जड़ें क्यों नहीं जम पाई और उसका फैलाव क्यों नहीं हो पाया?
  यह सही है कि एक समय था जब भारत में वैज्ञानिक मानसिकता थी। बुद्ध और उससे पहले चार्वाक और लोकायत ने उस समय तार्किक सोच को प्रतिपादित किया। वाराहमिहिर, आर्यभट्ट, सर्जन सुश्रुत भी हुए। 7वीं सदी
   ईसा पश्चात से लेकर 18वीं सदी  ईसा पश्चात तक (1000)साल तक अंधकार का युग रहा । कई बेहतरीन राजा थे, बेहतरीन दार्शनिक थे, बेहतरीन सन्त और समाज सुधारक थे मगर वैज्ञानिक कोई नहीं था ।
1 सर्व प्रथम हमारी संस्कृति में सवाल पूछे जाने को प्रतिष्ठा नहीं दी जाती ।
2 हमारे समाज में वैज्ञानिक मानसिकता का प्रसार न होने का दूसरा कारण परिवार में निरंकुशता का होना है।
3 तीसरी बात यह है कि महान व्यक्तियों को देवताओं की तरह पूजा जाना है। आ लोचनात्मक विश्लेषण व्यक्तियों का नहीं किया जाता।
4 वैज्ञानिक मानसिकता की राह में चौथी रूकावट हमारे आमजन पर परम्परागत रीति रिवाज का जबरदस्त शिकंजा है ।
5 हमारे देश में वैज्ञानिक मानसिकता के विकास न कर पाने का सब से महत्वपूर्ण कारण जाति-व्यवस्था और पितृसत्ता है।
6 हमारे देश में आज भी ब्रह्म और परब्रह्म है- इन दोनों का मिश्रण है। यही सत्य है बाकी सब मिथ्या है । संसार ही स्वयं में मिथ्या या माया है तो यहाँ वैज्ञानिक  दृष्टिकोण का विकास कैसे हो ?
साइंटिफिक टेम्पर पर हमला आज कल बहुत तेज हो गया है । वैज्ञानिक विचारों और इतिहास का मिथ्याकरण जोर शोर से किया जा रहा है ।
इन्टॉलरेंस हदें पार करती जा रही हैं
वैज्ञानिक , धर्मनिरपेक्ष और विवेकशील बुद्धिजीवियों का कत्ल कट्टरपंथी ताकतों ने कर दिए हैं । डॉ नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे, एम एम कुलबर्गी , गौरी लंकेश
संक्षेप में वैज्ञानिक नजरिया या दृष्टिकोण जीवन को देखने का एक दृष्टिकोण है , सफल होने का तरीका है और एक अच्छा इंसान बनने का। यदि हम यह विश्व दृष्टिकोण अपनाते हैं , हम अपने जीवन में मौलिक बदलाव कर सकते हैं , अपने सामूहिक जीवन में, अपने सामाजिक जीवन में और यहाँ तक कि अपने देश के जीवन में । आईये हम इस प्रकार के बदलाव के लिए प्रतिबद्ध हों ।
रणबीर सिंह दहिया
    

सोमवार, 1 मई 2017

EXECUTIVE COMMITTEE

1. R.S.Dahiya --09812139001/ beerdahiya@gmail.com

2 Parmod Gouri -- 09812044915/ gouripramod64@gmail,com

3 Dharam Singh-- 08901210444/ dharamsingh141963@gmail.com

4 Sohan Das ---0946675178/ sohandasshgvs@gmail.com, sohandasshgvsharyana@gmail.com

5 Naresh Prerna -- 09416240529--/ naresh.aipsn@gmail.com, nareshnatak@gmail.com

6 Bhim Samalkha--09813154340/ bhim0079@gmail.com

7  Sheespal ---09671558890/ sphgvs@yahoo.com

8 Anita Sharma--08901210222/

9 Rajender Singh--09813087186

10 Ram Mehar ---09467088789,/ 08569882021/ rammeharsrc@gmail.com

11 Satbir Nagal--09215610535 / satbirnagal70@gmail.com

12 Rajesh Jind ---09466815465/rajeshartist@yahoo.com, rajeshartist87@yahoo.com

13 Maisha--08222985804/manisha14871@yahoo.com

14 Ved Priya-- 09992132961/ ved.priya@rediffmail.com

15 Krishan Malik--09466295561/krishanmalik@yahoo.com

16 Suresh Jind--09416232339/sureshuchana@rediffmail.com

17 Manish Jind---09416445422/ manishman2312@gmail.com

18 Rajpal--09466775554/ sparkelbaby@gmail.com

19 Madan Pal Chhokar --09991242789/

20 Vipin Kalra--09466621119/kalravipin1918@gmail.com

Satish Hathwala--09729193445/ chauhansatish1917@gmail.com

मंगलवार, 2 अगस्त 2016

ACTIVITIES OF JIND HGVS

xfrfof/k;ka o dk;ZØeksa esa Hkkxhnkjh
1- fnukad 23&24 vxLr 2014 dks gfj;k.kk foKku eap dh tujy ckWMh ehfVax esa ftyk lfpoe.M ds lkfFk;ksa us Hkkx fy;kA
2- fnukad 23&23 vxLr 2014 dks gekjs lg;ksxh laxBu ,l-,Q-vkbZ ds thUn esa gq, jkT; lEesyu dh lQyrk ds fy, fofHkUu ftEesnkfj;ksa dk fuoZgu fd;kA
3- tqykbZ&vxLr 2014 ds nkSjku ujokuk ds 11 xkaoksa ds Ldwyksa esa tuokpu fd;k x;kA ftuesa djhc 800 fo|kfFkZ;ksa us Hkkx fy;kA
4- o’kZ 2014 ds nkSjku ftyk Lrjh; cky foKku dkaxzsl esa 25 Vheksa us Hkkx fy;kA ftuesa ls 8 Vheksa dk p;u jkT; Lrjh; vk;kstu ds fy;s fd;k x;kA
5- fnlEcj 25&26] 2014 dks jksgrd esa iqLrd laLd`fr ij gqbZ jkT; Lrjh; dk;Z”kkyk esa ftyk ls 5 lkfFk;ksa us Hkkx fy;kA
6& 11 tuojh 2015 dks ujokuk esa efgyk eqn~nksa ij fofHkUu laxBuksa ds lkFk feydj ,d lsfeukj dk vk;kstu fd;k x;kA ftlesa djhc 100&125 efgykvksa us Hkkx fy;kA eq[; oDrk tuoknh efgyk lfefr dh jkT; desVh usrk lqJh “khyk th FkhA
7- gj o’kZ 8 ekpZ dks efgyk fnol ij lg;ksxh laxBuksa ds lkFk feydj dk;ZØeksa esa lfØ; Hkkxhnkjh dh tkrh gSA
8- “kghnh fnol dh iwoZ la/;k ij ekpZ 22] 2015 dks nukSnk esa Mh-okbZ-,Q-vkbZ- ds lkFk feydj la;qDr :i esa [ksydwn izfr;ksfxrk dk vk;kstu fd;kA ftlesa vkl&iM+ksl ds ntZuksa xkaokas dh vyx&vyx [ksy Vheksa us Hkkx fy;kA blh fnu thUn esa fofHkUu laxBuksa ds lkFk feydj la;qDr :i esa lkaLd`frd dk;ZØe dk vk;kstu fd;k x;kA ftlesa xhr] ukVd] Hkk’k.k] vkYgk] dksfj;ksxzkQh] fxn~nk vkfn dh izLrwfr dh xbZA djhc 500 yksxksa dh Hkkxhnkjh FkhA ,d “kq:vkr ukVd dks dkQh ljkgk x;kA
9- f”k{kk ds eqn~ns ij 29 ekpZ 2015 dks jksgrd esa jkT; Lrjh; vlSEcyh gqbZA ftlesa f”k{kk ls tqM+s rhu fo’k;kas ij eq[; oDrk ds :i esa loZJh MkW0 viwokZuUn] ,ySDl o izeksn xkSjh us csgn le`} oDrO; j[ks xlsA ftlesa ftyk ls 22 lkfFk;ksa us Hkkx fy;kA
10- fo”o LokLF; fnol¼7 vizSy 2015½ ds ekSds ij 5 vizSy¼jfookj½ dks ukxfjd gLirky thUn esa jkT; Lrjh; vlSEcyh dk vk;kstu fd;k x;kA ftlesa 10 ftyksa ls djhc 180 dk;ZdrkZvksa us Hkkx fy;kA ftlesa fnYyh ls vk, MkW0 jeu us jk’Vªh; xzkeh.k LokLF; fe”ku dh fLFkfr] jktLFkku ls vk, oDrk us fu%”kqYd nok forj.k ds vuqHko o MkW0 vkj-,l- nfg;k us gfj;k.kk esa LokLF; dh fLFkfr ij oDrO; j[ksA 7 vizSy 2016 dks ftyk Lrjh; dk;Z”kkyk dk vk;kstu fd;k x;kA
11- v/;kidks ds lkFk feydj 9oha ls 12oha rd ds fo|kfFkZ;ksa dks fu%”kqYd V~;w”ku i<+kus dk dk;Z fd;k x;kA tks vusd mrkj&p<+koksa ds lkFk fujUrj lapkfyr djus dk iz;kl tkjh gSA
12- “kghn pUnz”ks[kj vktkn iqLrdky; nukSnk esa lfefr }kjk foKku fnol ds ekSds ij 28 Qjojh 2016 dks f”kooekZ }kjk fyf[kr lkr ØkfUrdkfj;ksa dh thofu;ksa ij vk/kkfjr iqLrd laLe`fr;ka esa ls 50 loky rS;kj djds fuca/k o isafVax izfr;ksfxrk vk;ksftr dh xbZA ftlesa 151 fo|kfFkZ;ksa us Hkkx fy;kA eq[; oDrk ds :i esa jkT; lfpo lksgunkl us oDrO; j[kkA
13- ukVd Vhe }kjk vusd voljksa ij fofHkUu f”k{k.k laLFkkvksa o xkaoksa esa ukVd o lkaLd`frd dk;ZØeksa dh izLrwfr;ka dh xbZA
14- 27 flrEcj dks “kghnsvkte Hkxrflag dh t;fUr o 23 ekpZ dks “kghnh fnol ds ekSds ij ujokuk o thUn esa lka>k lsfeukj o lkaLd`frd dk;ZØeksa dk vk;kstu fd;k x;kA
15- eqa”kh izsepUn t;Urh o “kghn m|eflag “kgknr fnol ij fgalk izeks /keZ% ukVd dh izLrwfr dh xbZA
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      1& lfØ; o vkRefuHkZj ftyk dsUnz dk fuekZ.k djukA
2& LorU= ctV dks’k dh O;oLFkk djukA
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      2& lHkh Lrj desfV;ksa dh fujUrjrk esa ehfVaxs djuk vkSj Bksl igydneh ysdj lq/kkj dk;kZsa dks djukA
      3& lelkef;d fo’k;ksa ij o’kZ esa de ls de nks lsfeukj] odZ”kki o xksf’B;ka vkfn vk;ksftr djukA
      4& LFkkuh; Lrj ij Bksl gLr{ksi ds fy, f”k{kkfonksa] oSKkfudksa] MkWDVjksa o ofj’B ukxfjdksa ls le;&le; ij xaHkhj fopkj&foe”kZ djukA
5& ukVd Vheksa dks iquxZfBr o lfØ; djrs gq, mudh izLrwfr;ksa dh la[;k c<+kukA
6& v{kj Hkou esa csgrj fdLe dh fQYesa fn[kkuk] t:jrean fo|kfFkZ;ksa dks i<+kukA
7& lkekftd&lkaLd`frd ?kVukvksa ij QkSju gLr{ksi djukA
8& efgyk ,oa ;qok usr`Ro ds fodkl ds fy;s fo”ks’k iz;kl djukA
9& fofHkUu laxBuksa o laLFkkvksa ds lkFk usVofdZax djrs gq, O;kid IysVQkeZ dk fuekZ.k djukA
10& iBu&ikBu o iqLrd laLd`fr dk fodkl djukA
      lkfFk;ksa] gekjs dke us yksxksa esa cgqr mEehnsa txk nh gSa vkSj ge Lo;a Hkh egRodka{kh gSaA blfy, Lo;a gh izkFkfedrk,a r; djus ds vk/kkj ij viuh lkaxBfud] oSpkfjd {kerkvksa ,oa lkeqfgd dk;Ziz.kkyh fodflr djrs gq, gesa vkxs ds dke gkFk esa ysus dh t:jr gSA rkfd ge eq[; dkeksa ds vUrlZqq= tksM+rs gq, ,d etcwr ,oa laosnu“kkhy lkekftd&lkaLd`frd laxBu dk fueZk.k djus dh vksj vkxs c<+ ldsaA

fnukad%& 31&07&2016                                      vkidk lkFkh
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From: Suresh Kumar, Secretary -  email ID : hgvsjind@gmail.com, skuchana69@yahoo.in Mob. 9416232339