गुरुवार, 16 नवंबर 2023

मेरी क्यूरी का जीवन परिचय :*

 2. *7 नवंबर : मेरी क्यूरी की जयंती* 

 *मेरी क्यूरी का जीवन परिचय :* 

मेरी क्यूरी (मारिया स्क्लोडोवस्का) का जन्म 7 नवंबर 1867 को पोलैंड के वार्सा नामक स्थान पर हुआ था। एक प्रतिभाशाली विद्यार्थी होने के साथ-साथ वे वहां के क्रांतिकारी संगठनों की छात्र कार्यकर्ता भी थीं। 1891 में अपनी उच्च शिक्षा जारी रखने के लिए वे पेरिस गईं। वे 1894 में *पियरे क्यूरी* से मिलीं और 1895 में उनसे विवाह कर लिया। 1903 में उन्होंने *डॉक्टर ऑफ़ साइंस* की उपाधि प्राप्त की। *अपने पति तथा हेनरी बेकरेल के साथ मिलकर उन्होंने रेडियोधर्मी अवशेषों से रेडियम को अलग करने के तरीकों को विकसित किया जिसके लिए इन तीनों को 1903 का भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया।* 1906 में अपने पति की दु:खद मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपना शोध जारी रखा और *1911 में रसायन विज्ञान में अपना दूसरा नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया।* शांत, गरिमापूर्ण और विनम्र रहते हुए अपनी दोनों बेटियों का पालन-पोषण किया जिन्होंने क्रमश: विज्ञान तथा सामाजिक विज्ञान को अपने कार्य क्षेत्र के रूप में चुना। उनकी बेटी *ईरीन जोलीट क्यूरी* ने अपने पति *जोलीट* के साथ मिलकर 1935 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया जबकि उनकी दूसरी बेटी *ईव लाबोसे क्यूरी* जो स्वयं एक पत्रकार थी और जिनके पति *लाबोसे जूनियर* उस समय संयुक्त राष्ट्र के यूनिसेफ़ प्रमुख थे, ने संस्था को 1965 का नोबेल शांति पुरस्कार दिलवाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया था। इस प्रकार मेरी क्यूरी न केवल दुनिया की एकमात्र वैज्ञानिक बन गईं जिन्होंने *विज्ञान की दो अलग धाराओं में नोबेल पुरस्कार* प्राप्त किए अपितु अपने बच्चों को भी इस पुरस्कार को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। *रेडियोधर्मिता* शब्द भी क्यूरी दंपत्ति द्वारा घड़ा गया था। *4 जुलाई 1936* को 66 वर्ष की अवस्था में उनका निधन हो गया। *रसायन विज्ञान में उनके द्वारा नोबेल प्राप्त करने के शताब्दी वर्ष 2011 को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय रसायन विज्ञान वर्ष के रूप में मनाया गया।* 


 *मेरी क्यूरी और रेडियोधर्मिता :* 

मेरी क्यूरी दो रेडियोधर्मी तत्त्वों, *रेडियम* और *पोलोनियम* की खोज में शामिल थीं, उन्होंने अपनी बेटी ईरीन जोलीट के साथ प्रथम विश्व युद्ध के घायल सैनिकों के घावों को ठीक करने में इन रेडियोधर्मी तत्त्वों का काफ़ी प्रयोग किया। वर्तमान में इनका उपयोग कैंसर चिकित्सा, कृषि, प्रतिक्रिया तंत्र को समझने, जैव परख इत्यादि के लिए किया जाता है। यद्यपि मेरी और उनके पति गरीबी से जूझते रहे और अपनी बेटियों का लालन-पालन भी बड़ी मुश्किल से कर पाए, फिर भी *उन्होंने यह कहते हुए अपनी खोजों को पेटेंट कराने से साफ़ मना कर दिया कि उनका शोध आमजन के लिए होना चाहिए, न कि मुनाफ़ाखोरों के लिए।* उन्होंने अपने नोबेल स्वर्ण पदक को भी युद्ध प्रभावित लोगों और सैनिकों की सहायता के लिए देने का प्रस्ताव किया था। क्यूरी दंपत्ति ने अपनी नोबेल पुरस्कार राशि का काफ़ी हिस्सा दोस्तों, छात्रों तथा गरीबों को दान कर दिया। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है, *"मैडम मेरी क्यूरी शायद एकमात्र ऐसी व्यक्ति थीं जिन्हें प्रसिद्धि भ्रष्ट नहीं कर सकी।"* 


 *एआईपीएसएन की इस अवसर पर की जाने वाली गतिविधियां :* 

* मेरी क्यूरी के जीवन पर पोस्टर प्रदर्शनी तथा व्याख्यान; 

* 'विज्ञान और महिलाएं' विषय पर वाद-विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं; 

* 'विज्ञान और समाज' विषय पर वाद-विवाद और निबंध लेखन प्रतियोगिताएं।

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