गुरुवार, 16 नवंबर 2023

सावित्रीबाई फुले जयंती)*

 12. *3 जनवरी : राष्ट्रीय महिला शिक्षक दिवस (सावित्रीबाई फुले जयंती)* 

 

*परिचय* 

सावित्रीबाई फुले एक शिक्षक, सुधारवादी, कवि और महिला अधिकारों के लिए नारीवादी आंदोलन की योद्धा थी। उन्होंने जाति और लिंग भेद के विरुद्ध लगातार लड़ाई लड़ी। उन्हें भारत की पहली महिला शिक्षक कहा जाता है। उन्होंने और उनके पति ज्योतिराव फुले ने भारत में सामान्य रूप से और महाराष्ट्र में विशेष रूप से महिलाओं के अधिकारों के संघर्ष में भूमिका निभाई। उन्होंने मिलकर 1848 में छात्राओं के लिए पहली आधुनिक स्कूल स्थापित किया।


सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा ज़िले के एक गांव में हुआ था। जब उनका विवाह ज्योतिराव फुले से हुआ तो उनकी आयु 10 वर्ष और उनके पति की 13 वर्ष थी। उनके बच्चे नहीं हुए परंतु उन्होंने यशवंतराव को गोद ले लिया जिसे उच्च जाति द्वारा त्याग दिया गया था क्योंकि उसका जन्म एक ब्राह्मण विधवा से हुआ था। 10 मार्च 1897 को बुबोनिक प्लेग की विश्वव्यापी तीसरी महामारी के समय पीड़ित रोगियों की देखभाल करते हुए उनकी मृत्यु हो गई।


विवाह के समय सावित्रीबाई निरक्षर थीं। उनके पति ने उन्हें पढ़ाया। अपने पति के अलावा सखाराम यशवंत परांजपे और केशव शिवराम भावलकर (जो उनके पति के मित्र थे) से भी उन्होंने शिक्षा ग्रहण की। फिर उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम में पहले पुणे नॉर्मल स्कूल और फिर अहमद नगर में एक अमेरिकी मिशनरी सिंथिया फर्रार में दाखिला लिया। गणित, भौतिकी और सामाजिक अध्ययन सभी पारंपरिक पश्चिमी पाठ्यक्रम का हिस्सा थे।


 *सावित्रीबाई की विरासत :* जिस प्रकार डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने समाज के उत्पीड़ित वर्ग के उत्थान के लिए कार्य किया, वैसा ही कार्य सावित्रीबाई ने लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में किया। उन्होंने क्रांतिकारी नारीवादी सगुनाबाई क्षीरसागर की सहायता से पुणे के महरवाड़ा में लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया। 1850 के दशक में उन्होंने कुल 18 स्कूल खोले जिनमें विभिन्न जातियों के बच्चे पढ़ते थे जिनमें बलात्कार पीड़िताओं के बच्चे भी थे। जब यह पता लगता था कि वह लड़कियों को शिक्षा दे रही हैं और उन बच्चों को भी जिनके पिता अज्ञात थे, तो उच्च वर्ण के धार्मिक लोग उन्हें गालियां देते, डांटते और उन पर पत्थर भी फेंकते थे। इन सब से बचने के लिए वह बुर्का पहनकर स्कूल जाती थीं और स्कूल पहुंचकर उतार देती थीं। वह कवि भी थीं जिन्होंने दबे-कुचले वर्ग का वर्णन अपनी कविताओं में किया है। उन्हें पहली पीढ़ी की आधुनिक भारतीय नारीवादियों में से एक के रूप में जाना जाता है जिन्होंने ब्रिटिश शासन के समय भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। 


उनकी जयंती हर साल 3 जनवरी को भारत में बालिका दिवस के रूप में मनाई जाती है। महिला शिक्षा के लिए उनकी सेवाओं के प्रति सम्मान के रूप में पूर्ववर्ती पुणे विश्वविद्यालय का नाम बदलकर 2015 में सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय कर दिया गया था। 


 *बालिका दिवस के उपलक्ष में एआईपीएसएन के कार्यक्रम :* 

1. सावित्रीबाई फुले पर पोस्टर बनाना; 

2. महिला शिक्षा के महत्त्व पर कार्यक्रम; 

3. 3 जनवरी को महिला शिक्षक दिवस के रूप में घोषित करने के लिए प्रयास/कार्यक्रम।

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